पेट्रोल पंपों पर क्रेडिट कार्ड से भुगतान पर अब नहीं मिलेगी छूट, बंद हो रही यह व्यवस्था

भोपाल। महंगे पेट्रोल डीजल का बोझ झेल रहे वाहन चालकों को अब एक और झटका लगने वाला है| पेट्रोल पंपों पर क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने पर एक अक्टूबर से अब कोई छूट नहीं मिलेगी।  अभी तक सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियां क्रेडिट कार्ड से ईंधन के लिए भुगतान पर 0.75 प्रतिशत की छूट दे रही थीं। करीब ढाई साल पहले डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहन के लिए यह व्यवस्था शुरू की गई थी।

करीब ढाई साल पहले डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए करीब ढाई साल पहले क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने पर छूट देने की व्यवस्था शुरू की गई थी। पेट्रोल कंपनियों की सलाह पर भारतीय स्टेट बैंक सहित अन्य बैंकों ने अपने क्रेडिट कार्ड उपभोक्ताओं को एसएमएस कर सूचना देनी शुरू कर दी है। भोपाल में  करीब 111 पेट्रोल पंपों पर रोजाना करीब तीन हजार लोग क्रेडिट कार्ड से भगुतान कर पेट्रोल खरीदते हैं। छूट खत्म होने पर इन उपभोक्ताओं की संख्या कम हो जाएगी। हालही में प्रदेश सरकार ने पेट्रोल डीजल पर वैट में बढ़ोत्तरी की है, जिससे देश भर में सबसे महंगा पेट्रोल डीजल प्रदेश के लोग खरीद रहे हैं| इस व्यवस्था के बंद होने से  क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने वाले उपभोक्ताओं की कमी आएगी| शहर में 40 हजार ऐसे लोग हैं, जो पेट्रोल खरीदने पर 0.75 छूट मिलने के कारण क्रेडिट कार्ड रखते हैं। रोजाना करीब तीन हजार लोग पेट्रोल लेते समय क्रेडिट कार्ड से भुगतान करते हैं। वहीं 1.5 लाख से ज्यादा लोग पेट्रोल लेने के लिए डेबिट कार्ड पास रखते हैं। इनमें से रोजाना 20 से 25 हजार डेबिट कार्ड से पेट्रोल भराने के लिए भुगतान करते हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है, क्यूंकि डिजिटल पेमेंट का चलन बढ़ा है| हालांकि पेट्रोल पंपों पर ऑनलाइन पेमेंट के लिए मोबाइल ऐप से अधिक लोग भुगतान करने लगे हैं। मोबाइल पेमेंट ऐप कंपनियां कैश बैक भी दे रही हैं।

उल्लेखनीय है कि 2016 के आखिर में नोटबंदी के बाद केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों इंडियन आयल कॉरपोरेशन (आईओसी), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (एचपीसीएल) को पेट्रोल-डीजल की खरीद के लिए कार्ड से भुगतान पर 0.75 फीसदी की छूट देने का निर्देश दिया था। क्रेडिट-डेबिट कार्ड और ई-वॉलेट के जरिए 0.75 फीसदी की छूट को दिसंबर, 2016 में शुरू किया गया था। यह व्यवस्था ढाई साल से अधिक समय तक चली। अब इसे बंद करने का फैसला किया गया है। 

 

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