राम ने जन्मना बन्द कर दिया और रावण ने मरना

भोपाल।

जो मरता है वह आतिशबाजी दिखाता पुतला है और जो मारता है वो तिलक करने वालों को उम्मीद भारी नजरों से देखता है।  दिल्ली वाला कहता है बेरोजगार हूं  इसलिए यह भेष धारण कर रखा है। रावण से भी तो काम ही मांगा था उसका अट्टास सुनकर धनुष छूटने से बचा है। हो सकता हो यह राम की शक्ति हो। लेकिन बाण इसलिए निशाना चूक रहा है क्योंकि डर है कि इतने बड़े लोगों से चरण छुआने के बाद कल रोजगार पर कैसे जाऊंगा? अरुण गोविल  राम बनने के बाद फिल्मों से बाहर हो गया है। सीता घर के काम कर रही है। द्रोपती का सिगरेट पीना सुहाता नहीं है।  डर रहा हूँ। रिक्वेस्ट कर रहा हूँ कि हे रावण तू मर तो जाना लेकिन एक साल भर लिए क्योंकि तुझे मारना भी एक दिन का रोजगार दिलाता है।

 भोपाल में राम बना किसान का बेटा तो तिलक करते महानुभाव से पूछने की सोचता है कि कर्जमाफी की कतार में बाप खड़ा है। नम्बर की उम्मीद है। अभी तो टोकन भी नहीं मिला है। मुझे बेरोजगारी भत्ते के चेक का इंतजार है।  वादों का अट्टहास रावण के अट्टहास से भी क्रूर लगता है। वो पूछता है पहले किसके पाप को मारना चाहेगा?  फिर भी आज का रोजगार तो रावण के मारने से ही पूरा होगा। मैं जल्दी रावण को मारने की फिराक में था क्योंकि राम के वस्त्रों ओर बनावटी शस्त्रों का बोझ अब सहन नहीं हो रहा है। सर भारी होता जा रहा है। नारी के अपहरण करने वाले को हम बुराई का प्रतीक बन कर हर साल जनता को आगाह करते हैं। लेकिन हम हनीट्रैप तक कि ऊंचाईयां छू रहे हैं। अबोध बालिकाओं के रेप करके मारने तक के अपराध तक पुहंच चुके हैं। अपराधों की ऐसे गिनती करने लग गए हैं कि तेरे राज से मेरे राज में घटनाएं कम हुई हैं। रावण प्रकांड विद्वान था उसके अपराध का स्तर भी ऊंचा था सजा भी मर्यादा पुरूषोत्तम ने दी। हम घिनोने हो गए इसलिए मारने वाला भी वैसा ही है। तभी तो कह रहा हूँ राम ने जन्मना बन्द कर दिया और रावण ने मरना।

बात काफी पुरानी है। आयोजकों में अनुदान की कमी का झगड़ा हो रहा था। मैंने पूछ ही लिया कि यह झगड़ा आयोजन की विफलता का है या अनुदान कम मिलने का  तब से मुझे उस आयोजन का निमंत्रण आना ही बंद हो गया। आज जब समाचार पत्रों में पढ़ा कि रावण ने तीर से जलने से मना कर दिया। मशक्कत पेट्रोल से जलाने में भी हुई। तब याद आया अनुदान के असंतुलन ने पटाखों का संतुलन बिगाड़ दिया होगा । सोचता हूं! यदि रावण ने सीता का हरण नहीं किया होता तो भारत में बेरोजगारी का ग्राफ कितना बढ़ गया होता। सरकारें कितनी परेशान होतीं। बुराई को मिटाने का अनुपम उदाहरण नहीं मिलता। जब हमें पता है कि रावण बुराई का प्रतीक है और राम अच्छाई का। फिर हम राम बनने में कोई फायदा क्यों नहीं खोज पाते हैं। रावण बनने से एमएलए बनने के चांस अधिक हैं। इसलिए रावणों की संख्या हर साल बढ़ रही है। बड़े मैदानों से गलियों में आ गया है रावण।

(लेखक सुरेश शर्मा वरिष्ठ पत्रकार है)

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