आर्थिक सर्वेक्षण ने खोली पोल, कांग्रेस का आरोप शिव'राज' में पिछड़ा मप्र

भोपाल| मध्य प्रदेश को पूर्व की सरकार हमेशा समृद्ध प्रदेश होने का दावा करती आई है, लेकिन बजट से पहले राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण की जो रिपोर्ट जारी हुई जिसमे प्रदेश के आर्थिक हालातों की पोल खोल दी| मप्र जहाँ कृषि क्षेत्र में पिछड़ा बताया गया है, बल्कि कुपोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ पाया गया है| आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के जारी होने के बाद पिछड़ेपन के लिए कांग्रेस ने तत्कालीन बीजेपी सरकार की नीतियों को जिम्मेंदार बताया है| 

गरीबी के मामले में मप्र अभी भी देश 29 राज्यों में 27 वें स्थान पर है। शिक्षा सूचकांक में देश के 29 राज्यों में प्रदेश का स्थान 23 वां है। कृषि फसलों की वार्षिक मूल्य वृद्धि में 2013-14 से 2017-18 में 3.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि मप्र में यह मात्र 0.1 प्रतिशत ही रही। गेहूं और धान जैसी फसलों का उत्पादन कम हुआ है।

कांग्रेस ने प्रदेश इस स्थति को लेकर पूर्व की भाजपा सरकार को दोषी बताया है| कमलनाथ सरकार का कहना है शिवराज सरकार ने इतना कर्ज लिया लेकिन प्रदेश की जनता को इसका लाभ नहीं मिला, बल्कि प्रदेश की हालत ख़राब हुई है| शिवराज राज्य को समृद्ध प्रदेश का दर्जा देते थे, लेकिन संसाधनों की संगठित लूट की गई है|  मुख्यमंत्री व कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कमलनाथ के मीडिया समन्वयक नरेंद्र सलूजा ने शिवराज सरकार को घेरा है उन्होंने ट्वीट कर कहा है कि आर्थिक सर्वेक्षण ने शिवराज के राज की पोल खोल दी है| उन्होंने रिपोर्ट के कुछ खास पॉइंट शेयर कर पूछा है क्या यह है इनका विकसित प्रदेश 


•प्रदेश में 2.34 लोग अभी भी ग़रीब। ग़रीबी में देश के 29 राज्यों में हम 27वे स्थान पर

•सिर्फ़ 23% लोगों को नल का पानी उपलब्ध

•शिक्षा के क्षेत्र में हम 23 वे स्थान पर

•5 साल से छोटे 42% बच्चे अविकसित

• प्रदेश में किसान बढ़े, खेती का रक़बा 1.66 हेक्टेयर कम हुआ

•शिशु मृत्यु दर 47 , जो देश में सर्वाधिक

•मातृत्व मृत्य दर 173, सर्वाधिक

• 68.25 लाख लोग मनरेगा के भरोसे

•सिर्फ़ 30% लोगों को खाना बनाने के लिए स्वच्छ ईंधन उपलब्ध

•प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रो, डॉक्टर्स, नर्स की बड़ी कमी


प्रति व्यक्ति आय में पिछड़ा मप्र 

सर्वेक्षण के अनुसार मध्यप्रदेश में प्रति व्यक्ति आय देश एवं समान परिस्थिति वाले राज्यों की तुलना में कम है। देश के प्रमुख राज्यों में बिहार, झारखंड, ओड़सिा और उत्तरप्रदेश को छोडक़र शेष राज्यों की प्रति व्यक्ति आय मध्यप्रदेश से अधिक है। मध्यप्रदेश को कम प्रति व्यक्ति आय वाले राज्यों की श्रेणी में रखा जाता है। वित्त वर्ष 2018 19 के प्रचलित मूल्य पर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय 90 हजार नौ सौ 98 रूपए थी, जो देश की प्रति व्यक्ति आय एक लाख 26 हजार छह सौ 99 रूपयों का मात्र 71़ 8 प्रतिशत है। 

सर्वाधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे 

सर्वेक्षण के मुताबिक देश में गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले व्यक्तियों का अनुपात 21़ 92 प्रतिशत और मध्यप्रदेश में 31़ 65 प्रतिशत है। देश में उत्तरप्रदेश और बिहार राज्यों को छोडक़र मध्यप्रदेश में सर्वाधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे है, जिनकी संख्या दो करोड़ 34 लाख है। वहीं इसमें कहा गया है कि केवल 30 प्रतिशत लोग खाना बनाने के लिए स्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल करते हैं। राज्य में सिर्फ 23 प्रतिशत घरों में नल द्वारा पानी आता है। राष्ट्रीय कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट वर्क 2018 19 के अनुसार मध्यप्रदेश में कृषि मजदूरी की दर 210 रूपए देश के अन्य राज्यों की तुलना में न्यूनतम है। मनरेगा में 68़ 25 लाख परिवार दर्ज हैं, जो व्यापक गरीबी का सूचक है।

शिशु मृत्यु दर

शिशु मृत्यु दर में भी मध्य प्रदेश की स्तिथि चिंताजनक है, सर्वेक्षण में बताया गया कि राज्य में प्रति हजार जीवित जन्म पर शिशु मृत्यु दर 47 है, जो देश के अन्य राज्यों की तुलना में सर्वाधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर शिशु मृत्यु दर 33 प्रति हजार है। राज्य में मातृत्व मृत्यु दर प्रति एक लाख प्रसव पर 173 है, जो राष्ट्रीय दर 130 और अधिकतर राज्यों की तुलना में बहुत अधिक है। राज्य में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु दर 77 (वर्ष 2011) है, जो कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में असम को छोडक़र सर्वाधिक है। प्रदेश में 52़ 4 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी से पीड़ित हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सकों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों के पद बड़ी संख्या में रिक्त हैं। सर्वेक्षण के अनुसार शिक्षा और पोषण के क्षेत्र मे भी राज्य की स्थिति बेहतर नहीं है।

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