मिशन चंद्रयान-2 की कामयाबी में MP के इन दो युवा साइंटिस्टों का भी रहा योगदान

रतलाम।

भारत ने चांद पर एक और कामयाबी हासिल की और चंद्रयान-2 दोपहर 2.43 बजे श्रीहरिकोटा (आंध्रप्रदेश) के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया। इसे सबसे शक्तिशाली रॉकेट जीएसएलवी-मार्क III-एम1 के जरिए प्रक्षेपित किया गया। लेकिन सबसे खास बात ये है कि इसकी लाचिंग में एमपी का भी खास कनेक्शन है।इस कामयाबी में एमपी के दो युवा सांइटिस्टों का भी योगदान रहा। जिसमें पहला नाम रतलाम का एक युवा साइंटिस्ट हिमांशु शुक्ला और दूसरा कटनी के कैमोर की मेघा भट्टा है, जो कि देश के उन चुनिंदा और होनहार साइंटिस्टों में शामिल हैं, जिन्हें इसरो ने अपने इस महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-2 के लिए चुना था।

हिमांशु अलकापुरी ए-सेक्टर में रहते हैं, उनके पिता चंद्रशेखर शुक्ला रोडवेज में थे, जो कि अब वकालत कर रहे हैं। हिमांशु इसरो में साइंटिस्ट के पद पर पदस्थ हैं। 'चंद्रयान-2' में उन्होंने बूस्टर तैयार करवाने में योगदान दिया है। किसी भी रॉकेट में बूस्टर प्रेशर बनाते हैं, जिससे रॉकेट ऊपर जाता है।हिमांशु ने उज्जैन से केमिकल ब्रांच में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। इसके बाद उन्होंने टीसीएस में जॉब की। कुछ समय बाद हिमांशु का चयन इसरो में हुआ, उस वक्त देश में सिर्फ दो ही पोस्ट निकली थीं। हिमांशु सफल प्रोजेक्ट मंगलयान में भी शामिल रह चुके हैं। 1350 किलो के इस सैटेलाइट को 15 महीने के रिकॉर्ड समय में तैयार किया गया था। इसमें 1 हजार वैज्ञानिकों की टीम लगी थी। चंद्रयान की लांचिंग का काम युद्ध स्तर पर चल रहा था। तीन दिन से हिमांशु लगातार 30-30 घंटे की ड्यूटी दे रहे हैं। वक्त मिलता है तब परिवार से बात करते हैं। हिमांशु के साथ वहां उनकी पत्नी आर्ची भी रह रही हैं। परिजन की ज्यादातर बार बात आर्ची से ही हो पाती है। अब एक महीने बाद वे रतलाम आएंगे। 

वही मेघा भट्ट चंद्रयान-2 में डाटा एनलिस्ट हैं। मेघा मूलत: कटनी से संबंध रखती हैं, लेकिन विज्ञान पढऩे से वैज्ञानिक बनने का सफर उनका जबलपुर से होकर गुजरा है। वे यहां रादुविवि की छात्रा ही नहीं रहीं, बल्कि वे विज्ञान के छात्रों की प्रेरणा भी रही हैं।आगे मेघा, चंद्रयान-2 से मिलने वाले डाटा का एनालिसिस करेंगी।उनके पिता यू एन भट्ट एसीसी कैमोर के इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट के डीजल सेक्शन में इंस्ट्रक्टर थे। यही वजह है कि मेघा ने अपनी हायर सैकेंड्री तक की शिक्षा यहीं पूरी की।उसके बाद वो उच्च अध्ययन के लिए जबलपुर चली गई।चंद्रयान-2 मिशन से जुड़ी मेघा ने रादुविवि से स्नातक और स्नातकोत्तर किया है। वर्ष 2004 में रादुविवि के फिजिक्स एंड इलेक्ट्रॉनिक्स डिपार्टमेंट से एमएससी की डिग्री हासिल की है। उसके बाद जर्मनी से पीएचडी की है। खास बात ये है कि मेघा का पीएचडी का विषय चंद्रयान-1 पर बेस्ड था। इसके आधार और अनुभव का उपयोग चंद्रयान-2 में किया। वे वर्ष 2006 से स्पेस एप्लीकेशन रिसर्च प्रोग्राम से जुड़ी हैं। वे अहमदाबाद फिजिकल रिसर्च लेबोरेटी में रिसर्च कर रही है। चंद्रयान-2 चांद की सतह पर उतरने के बाद जो डेटा भेजेगा उसका मेघा विश्लेषण करेंगी। उसके आधार पर चांद में जलवायु, जल लोह तत्व और मिनरल्स की जानकारी संकलित करेंगी। डेटा विश्लेषण के जरिए पता करने की कोशिश करेंगी कि चांद पर लावा फिर चीजों ने कैसे और किस तरह आकार लिया होगा।

इसरो के अनुसार ‘चंद्रयान-2’ चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में उतरेगा, जहां वह इसके अनछुए पहलुओं को जानने का प्रयास करेगा। चंद्रयान को चांद तक पहुंचने में 48 दिन लगेंगे और इसकी लैंडिंग दक्षिणी ध्रुव पर होगी।  इससे 11 साल पहले इसरो ने अपने पहले सफल चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-1’ का प्रक्षेपण किया था जिसने चंद्रमा के 3,400 से अधिक चक्कर लगाए और यह 29 अगस्त, 2009 तक 312 दिन तक काम करता रहा। यह भारत का तीसरा मिशन है। जियोसिंक्रोनस लॉन्च व्हीकल मार्क 3 भारत में अब तक बना सबसे शक्तिशाली रॉकेट है। यह चंद्रयान-2 को चंद्रमा की कक्षा तक ले जाएगा।


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